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वन पंचायतों की उखड़ती सांसों को ‘आक्सीजन’ देने की कवायद

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वन पंचायतों को शामिल कर रोजगार सृजन को खुलेंगे क्लस्टर, कार्ययोजना पर होमवर्क शुरू

सरकारी उपेक्षा की शिकार हैं सूबे की 12,168 वन पंचायतें

बीके श्रीवास्तव
देहरादून। यूं तो सत्ता की ड्योढ़ी से वनों की सुरक्षा और संरक्षण की कवायदों को अक्सर ही ‘पंख’ लगे लेकिन सिस्टम की कमी की वजह से ये धरातल पर उपलब्धियां नहीं बटोर सकीं। अगर सच के आईने में देखा जाए तो समूचे सरकारी तंत्र नें इस मामले में अब तक सिर्फ जबानी जमाखर्च ही किया है। यही वजह है कि जहरं वनों का दायरा सिमटा है, वहीं वन्य जीव और वन संपत्तियां असुरक्षित है। साथ ही वनों से सटे गांवों से ग्रामीणों के पलायन के आंकड़ों में भी तेजी से उछाल आया है। अब अर्से बाद सूबाई सरकार ने वन पंचायतों की सुध ली है, साथ ही सरकारी कवायदों को पंख लगे हैं,! स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित करने की योजना पर होमवर्क शुरू हो गया है ! योजना के पहले चरण में 50 वन पंचायतों को शामिल कर दस क्लस्टर खोले जाने की योजना है! जिसके जरिए स्थानीय स्तर पर पलायन थामनें को युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सृजित किए आएंगे। इसके लिए योजना में पांच करोड़ के बजट की व्यवस्था की गई है। हालांकि वनों के संरक्षण को सूबे में ब्रिटिश हुक्मरानों द्वारा 1930 में स्थापित 12,168 वन पंचायतें आज भी वजूद में हैं! साथ ही प्रत्येक वन पंचायत में सरपंच समेत नौ सदस्य भी है। इस लिहाज से आंकलन किया जाए तो वन संरक्षण और सुरक्षा को एक लाख से अधिक लोगों की फौज भी है। लेकिन सिस्टम की कमियों की वजह से उम्मीद के अनुरूप वन पंचायतें उतनी सक्रियता प्रदर्शित नहीं कर पा रही हैं। दरअसल नीति नियंताओं से लेकर समूचे तंत्र ने वन पंचायतों की दिशा और दशा सुधारने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। सरकारी तंत्र की उपेक्षा का आलम ये रहा कि न तो इन पंचायतों के चुनाव ही निश्चित समय पर कराने की दिशा में कोई कदम उठाया गया और न ही इनके लिए बजट का ही कोई प्राविधान ही किया गया। नतीजतन वन पंचायतों की सक्रियता में कमी आना लाजिमी है। इसकी एक वजह ये भी रही है कि वन पंचायतों के वजूद में रहते कभी ग्रामीणों के हक-हुकूक कायम थे! वनों से ग्रामीण खुद की जरूरतें पूरी करते थे, साथ ही वनों की हिफाजत को तत्पर रहते थे! लेकिन 1980 के दौरान वन अधिनियम के अमल में आने के बाद वनों में सरकारी दखल बढ़ा और लोंगों की उदासीनता भी बढ़ी। हालांकि इस खाई को पाटने में वन पंचायतें अहम भूमिका निभा सकती थी लेकिन वन पंचायतों को लेकर सरकारी तंत्र ने कभी संजीदगी नहीं दिखाई ! खास तो ये है कि अगर सरकारे वन पंचायतों का सहयोंग करती को स्थानीय स्त्र पर रोजगार के अवसर सुलभ होते और पलायन के बढ़ते आंकड़ों पर भी अंकुश लगता। साथ ही वन्य जीवों की सुरक्षा भी होती। इतना ही नही वनाग्नि की घटनाओं पर भी ब्रेक लगता। लेकिन राज्य गठन के बाद सत्ता में आई सरकारों ने वन संरक्षण और सुरक्षा के मामले में वन पंचासतों को कोई तरजीह नहीं दी! ये पहला मौका है जब सूबाई सरकार ने वन पंचायतों को योजना में तरजीह देते हुए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सुलभ करने की दिशा में कार्ययोजना पर होमवर्क शुरू किया है। यदि योजना पूरी निष्ठा, ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ अमल में आती है तो निश्चय ही वन पंचायतें पूरी तरह सक्रिय होकर न सिर्फ वन्य जीवों और वन संपत्तियों की हिफाजत में भी तंत्र को सहयोग देंगी। साथ ही जहां वन्य जीवों और संपत्तियों की तस्करी पर भी अंकुश लगेगा। लेकिन इसके लिए सरकार को महकमों और वन पंचायतों की जवाबदेही तय करने के साथ ही योजना में पारदर्शिता बरतनी होगी तभी वनों की दशा भी सुधरेगी।!




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