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‘सुशासन’ पर भारी ‘दुशासन’

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योगेश भट्ट, देहरादून। न जाने त्रिवेंद्र सिंह उत्तराखंड में किस ‘सुशासन’ का दावा कर रहे हैं । सुशासन होता तो पंकज पाण्डेय, चंद्रेश यादव, मिनाक्षी सुंदरम, राजेश कुमार समेत कुछ और आईएएस अफसरों को लेकर इतनी बातें नहीं तैर रही होतीं । सुशासन होता तो ‘दुशासन’ नहीं होते, हर जगह नौकरशाही में ‘गैंगवार’ नहीं छिड़ी होती । चर्चित नौकरशाह ओमप्रकाश और राधिका झा की भूमिका को लेकर भी तमाम सवाल नहीं उठ रहे होते ।
सुशासन तब होता है जब मुखिया के बगलगीर ‘दागी’ नहीं होते । सवाल जायज है, जब मुख्यमंत्री के ओएसडी और सलाहकार ही ‘दागी’ हों तो फिर कैसा सुशासन ? सुशासन होता तो आपदा के वक्त प्रदेश के नौकरशाह और नेता ‘स्टडी टूर’ के नाम पर परिवार सहित विदेश की सैर पर नहीं होते । सुशासन होता तो मुख्यमंत्री को बुलेटप्रूफ वाहन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। अफसर विधायकों को नजरअंदाज करने की जुर्रत नहीं कर पाते ।
ध्यान रहे सुशासन में जनता को हाशिये पर नहीं धकेला जाता, जनता की सहभागिता सुनिश्चत की जाती है । सुशासन में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सिर्फ जीरो टालरेंस जैसे जुमले नहीं गढ़े जाते, बल्कि सिस्टम को जिम्मेदार और जवाबदेह बनाया जाता है । एक खास बात यह भी कि सुशासन में राजा पर व्यक्तिगत हमले नहीं होते, इतनी जुर्रत कोई नहीं कर पाता ।
दरअसल सुशासन सिर्फ ‘ब्रांडिंग’ से या अपनी तारीफ में ढोल पीटने से नहीं आता । सरकार की मानें तो सुशासन के नाम पर डेढ़ साल में उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि एनएच घोटाले में अब तक हुआ डवलपमेंट है । सवाल यह है कि जिस एनएच 74 घोटाले में सरकार अपनी तारीफ के पुल बांध रही है, उसमें इस सरकार की आखिर ऐसी क्या भूमिका रही है ?
सच तो यह है कि सरकार की हीलाहवाली से घोटाले के असल गुनहगार और सूत्रधार अभी तक पकड़ से बाहर हैं। तीन सौ करोड़ से ऊपर की जांच का जिम्मा जिस एसआईटी के पास है, उसकी अपनी सीमाएं हैं । आईएएस और संवैधानिक पदों पर बैठे सफेदपोशों पर हाथ एसआईटी चाहकर भी नहीं डाल सकती। ऐसे में आईएएस पंकज पाण्डेय और चंद्रेश यादव से एसआइटी को पूछताछ की इजाजत दिये जाने को ऐसे प्रचारित किया जाना कि मानो सरकार ने भ्रष्टाचार पर बहुत बड़ी ‘चोट’ कर दी हो, बेहद आश्चर्यजनक है । जबकि शुरू से यह माना जाता रहा है कि 300 करोड़ से ऊपर का एनएच मुआवजा घोटाला बिना बड़े अफसरों और सफेदपोशों की मिलीभगत के संभव नहीं है ।
सरकार की मंशा सही होती तो इतनी बड़ी जांच अब सिर्फ एसआईटी के भरोसे नहीं छोड़ दी जाती । पहले तो जांच सीबीआई से ही करायी जाती, नहीं तो कोई अधिकार संपन्न जांच आयोग बैठाया जाता । बहरहाल, दोनो आरोपी अफसरों ने एसआईटी की जांच और उनके सवालों पर ही उल्टा सवाल खड़े कर दिये हैं । अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसका भविष्य क्या होने जा रहा है ।
बताते चलें कि आईएएस पंकज पाण्डेय, जिनका नाम इस घपले में प्रमुखता से लिया जा रहा है वह सरकार के खास अफसरों में शुमार हैं । बीते डेढ़ साल से शासन में वह महत्वपूर्ण पदों पर तैनात हैं। एनएच घोटाले को छोड़िये, हाल फिलहाल में कौशल विकास विभाग का निदेशक रहते हुए प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में भी उन पर मनमानी और धांधली के
आरोप हैं । जो सरकार जीरो टालरेंस का खम ठोक रही है, तमाम आरोपों की पुष्टि होने के बावजूद पंकज पाण्डेय का आज तक जवाब तलब तक नहीं कर पायी । छोड़िये पंकज पाण्डेय की बातें, मुख्यमंत्री के ओएसडी जेसी खुल्वे को लें उनकी विजिलेंस जांच आज तक शुरू नहीं हो पायी । खुल्वे कृषि विभाग के अधिकारी हैं और उन पर 70 लाख की वित्तीय अनियमित्ता की पुष्टि हो चुकी है । विभाग की ओर से काफी पहले उन्हें चार्जशीट दी जा चुकी है और शासन विजिलेंस जांच के आदेश भी कर चुका है । कहां है यह जांच आज तक किसी को कोई पता नहीं ।
चलिये अब एक नए सवाल के साथ आगे बढ़ते हैं , उत्तराखंड में ‘सुशासन’ है तो फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट स्किल डवलपमेंट को उत्तराखंड में पलीता कैसे लगा ? मुख्यमंत्री के अधीन रहे कौशल विकास व प्रशिक्षण विभाग में किसी ने कैसे करोड़ों का खेल कर दिया ? मुख्यमंत्री को वाकई इसकी भनक तक नहीं लगी या उनकी ओर से अफसरों को मनमानी की छूट रही । पहले ही पायेदान पर प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में संस्थाओं के चयन, प्रशिक्षण कार्यक्रम और योजनाओं में बड़े पैमाने पर गड़बड़झाला हुआ है । नियम और शर्तें बदलकर बाहरी कंपनियों को केंद्र आवंटित किये गए । जिन्हें केंद्र आवंटित किये गए, उन्होंने खुद उनका संचालन करने के बजाय आगे स्थानीय संस्थाओं को ठेका दे दिया । यह कोई आरोप नहीं हैं, बल्कि आधिकारिक जांच में सामने आयी हकीकत है। घपले का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई जगहों पर तो केंद्र सिर्फ कागजों में ही चलाए जा रहे हैं । एक ही स्वामित्व वाली कई अलग अलग संस्थाओं को प्रदेश में केंद्र आवंटित किये गए हैं । कुल मिलाकर जिस कौशल विकास से प्रदेश के युवाओं की तकदीर बदलने का दावा था उसके नाम पर जमकर बंदरबांट हुई है । सरकारी अफसरों ने ही नहीं बल्कि गैरसरकारी संस्था चलाने वाले कंसल्टेंट और साहब के करीबियों ने भी जमकर मजे लूटे। सरकारी खर्च पर निदेशक के साथ कंसल्टेट भी विदेश घूम आए। दिलचस्प यह है कि इसका खुलासा तब हुआ जब विभाग मुख्यमंत्री से हटकर हरक सिंह रावत के पास पहुंचा । मुख्यमंत्री विभाग नहीं छोड़ते तो संभवत: यह घपला सामने भी नहीं आता । आश्चर्य है कि एनएच प्रकरण पर खुद अपनी पीठ थपथपाने वाली सरकार इस पर अब तक ‘मौन’ है ।
अब सवाल एक बार फिर वहीं आ खड़ा होता है कि क्या यही ‘सुशासन’ है ? जवाब खोजने निकलें तो सवाल उतना ही गहराता चला जाता है । जरा देखो वन महकमे में क्या हो रहा है ? अफसरों के बीच ‘कुत्ते बिल्ली’ जैसी जंग छिड़ी है । न जंगल सुरक्षित हैं न जंगली जीव, मुनाफा कमाकर देने वाला वन निगम भी घाटे में डूबने लगा है । जरा नजरें प्रदेश के मेडिकल कालेजों और अस्पतालों पर डालो । मेडिकल कालेज रेफरल सेंटर बने हुए हैं और सरकारी अस्पतालों पर प्राइवेट कालेज और अस्पतालों की गिद्द नजर है। मरीजों की लूट के लिये दून मेडिकल कालेज के बाहर आए दिन दलालों में सिर फुटव्वल हो रहा है । शिक्षा हो या उच्च शिक्षा हालात हर जगह बदतर हैं । शिक्षा विभाग शिक्षकों और मंत्री की ‘जंग’ में फंसा है तो विश्वविद्धयालय सियासी अखाड़े बने हैं । विभागों के मंत्री कहते कुछ हैं और होता कुछ और है। सुशासन के दावे तब और खोखले नजर आते हैं जब उन तस्वीरों पर नजर पड़ती है, जिनमें ग्रामीण डंडी कंडी के सहारे कहीं बीमार को तो कहीं गर्भवती महिला को लेकर पहाड़ नाप रहे होते हैं । जिनमें स्कूल जाने के लिये रस्सी के सहारे बच्चे उफनती नदी पार करते दिखते हैं । रुह कांपने लगती है जब कहीं एंबुलेंस के इंतजार में सड़क पर बच्चे जनने की या कहीं इलाज के अभाव में जच्चा बच्चा के बीच रास्ते में दम तोड़ने की खबर आती है ।
सरकार को भले ही यह सब न महसूस हो रहा हो, लेकिन हालात विस्फोटक हैं । सुशासन पर इस वक्त ‘दुशासन’ हावी हैं । चाणक्य सूत्र की मानें तो यदि राजा स्वयं ‘शक्तिविहीन’ (शक्ति से तात्पर्य प्रशासनिक दक्षता से है) तो वह राज नहीं कर सकता, सुशासन नहीं दे सकता । ‘शक्तिविहीन’ राजा के राज में अराजकता फैल जाती है, आपसी कलह बढ़ने लगता है । सलाहकार और दरबारी भ्रमित करने लगते हैं । राज्य और जनता के हित हाशिये पर चले जाते हैं । सत्ता या तो अधिकारियों के हाथ में चली जाती है, या सहयोगी और करीबी उसका दुरूपयोग करने लगते हैं । राजा से प्रजा का भरोसा उठने लगता है । निसंदेह प्रदेश के मौजूदा हालात कुछ इसी तरह के हैं । राजनैतिक व्यवस्था, प्रोटोकाल, सेवा आचरण, सब पूरी तरह ध्वस्त है । अब नौकरशाह खुद शह मात के खेल में उतर आए हैं । राजकाज पर नौकरशाहों की सियासत हावी होती जा रही है । लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उत्तराखंड का हालिया नेतृत्व ‘शक्तिविहीन’ है। त्रिवेंद्र सिंह का प्रशासनिक अनुभव भले ही कम हो लेकिन प्रबल जनादेश के चलते वह एक ‘शक्तिशाली’ मुख्यमंत्री हैं । अभी वक्त है, उन्हें ‘दुशासनों’ को पहचानना होगा । उन्हें समझना होगा कि ‘सुशासन’ वह नहीं है जिसका वह ढोल पीट रहे हैं । सुशासन के असल मायने हैं आम आदमी का सरकार पर भरोसा ।




One thought on “‘सुशासन’ पर भारी ‘दुशासन’

  1. zvodretiluret

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